Awaraviews

Lights & Shadows behind the Films

vicissitude

काफी दिनों से एक सवाल के साथ जूझ रहा हूँ।

“अंजाम” देखी। जब माधुरी शाहरुख को मारने जाती है (क्योंकि उसने उसके पति और बेटी को मारा था) पर उसे disabled पाकर उसे ठीक करने का सोचती है। उसे ठीक करने के बाद एक सीन मे जहाँ माधुरी लटकी हुई है और शाहरुख उसके पैरो को पकड़कर लटका हुआ है और कहता है कि, “खुद को बचाने के लिए तुम्हे मुझे भी बचाना होगा” और माधुरी यह कहकर हाथ छोड़ देती है कि, “मेरे ज़िंदा रहने से ज्यादा तुम्हारा मरना ज़रूरी है” और आखिरी सीन मे दोनो मरे हुए दिखाई दिए हैं। मैं सोच रहा था कि यह क्या हुआ यहाँ?

मगर मेरे लिए सवाल आगे का था, क्या इस फिल्म को माधुरी के ज़िंदा रहने के साथ नहीं छोड़ा जा सकता था? अगर हाँ तो फिर सवाल रह जाता आफ्टर-लाइफ का। कई बार यह देखने को मिला है इस तरह की कहानियों मे की motive पूरा करना ही किसी लाइफ को ज़िंदा रखने का कारण बना दिया जाता है। और motive के बाद जब उसका जीवन बहुत विस्मय या सहानुभूति भरा होता है, या वो जीवन खुद सवाल करने लग जाए तो उस जीवन को मार देना ही ठीक समझा जाता है। वरना वो जीवन जिस चीज़ डिमांड रखेगा उसके समक्ष खड़े होने के लिए हम पता नही कितने ही जीवनों पर सवाल उठा देते हैं।
मुझे अपने दोस्त राकेश के लिखे लेख की कुछ लाइने याद आने लगी

“दूनिया उसके लिये वैसी ही थी जैसी सब के लिये वो भी भूख प्यास जानता था।”
“चारो तरफ आते-जाते लोगो की भीड़ कही से कही चली जा रही होती और वो वही पर ठहरा हुआ जैसे किसी के चरित्र की अदाकारी को पेश कर रहा होता।”
“कभी भी वो तमाशा दिखाने वाला बन जाता कभी तमाशे वाले का जमूरा बन जाता ।”

मै अब अपने आस-पास जो देख पा रहा हूँ वो किसी इंसान को समझने के लिए या तो हम उसे कोई शख्सीयत देते हैं, या फिर वो जो कर रहा है उसे किसी शब्द मे उतार कर किसी अदा(हरकत) को कोई नाम देने की कोशिश करते हैं। क्या यह दोनों कभी एक साथ आ सकते हैं? दोनों के बगैर किसी को समज पाने के लिए मुझे अपने आप को एक वजह बताने पड़ती है कि मैं इसे कैसे याद करूंगा। बहुत मुश्किल है किसी को यह सोचते हुए याद रखना कि वो क्या कर रहा था या उसे क्या कहा जाता है। दूसरों के सामने अपनी खुद की performance और हम किसी को कैसे देखते हैं उसमे उसमे कुछ तो फर्क होगा ही ना?
मगर मेरा सवाल अभी भी अंजाम फिल्म के उस सीन पर वापस आता हूँ।

या दूसरी भाषा मे मुझे यह समझ आता है कि कुछ तरह के जीवन की कल्पना सिर्फ Revenge के ज़रिए ही आ पाती है।

मैंने सवाल Revenge को सोचते हुए सोचना शुरू करा था। फिर सवाल बदला, हम अपनी खुद की कहानियों मे जो पात्र बनाते है उनका वास्तविकता से शायद कोई रिश्ता ना हो मगर वो जीवन जो हमने उन्हे दिया है उस जीवन का हमारे खुद के लिए क्या स्थान है? पर Revenge का सवाल अभी भी है।
मैंने अपने कई दोस्तो से बात करके इसको समझने की कोशिश मे लगा हुआ हूँ। एक बात तो उनकी बातचीत मे साफ थी कि जब कोई Revenge लेने की सोचता है तो वो यह कहता है कि मैं जिससे बदला ले रहा हूँ उसे भी यह पता होना चाहिए कि मैं उससे बदला ले रहा हूँ वरना वो जो मैं करूंगा वो Revenge नहीं होगा। फिर मेरा सवाल यह था कि, “जब कोई Revenge लेने की सोचता है तो उसका अपनी खुद के जीवन का क्या महत्व होता है?”
“मेरे दोस्तों मे एक का कहना था कि यह choice है कि महत्व किस चीज़ का है।

जिस कोण से हम देखते हैं, अनुभव, याद, और जो कर चुके हैं यह सब मिलकर भी वर्तमान मे हमारी भूमिका को नहीं समझा पाते, हम क्या हैं और क्या हो सकते हैं यह कभी एक साथ खड़े नहीं होते, क्यो?
आग को बचाकर रखने के लिए हमेशा किसी चीज़ को जलाते रहना होता है, कपड़े इंसान के नंगेपन को छुपाते हैं मगर क्या अंधेरे मे खड़ा नग्न इंसान इसे महसूस कर पाता है?

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April 26, 2010 Posted by | Uncategorized | Leave a comment

God Father

बुरा गेंगस्टर, वैश्या पागल तीनों शब्द और बोल अलग होते हैं. बुरा सैद्धांतिक तौर पर बताया जा सके तो अलग जवाब आएगा. शख्सियत का कद इतना छोटा हो जायेगा कि हाँ में जवाब बनना संभाविक हैं. सब अपने बुरे का कल्पना से नहीं बोले, वरना सिर्फ हाँ नहीं आता सब सपने साथ घटी सुनी देखीं छवियों से जवाब देते. मैं पागल को छोड़कर, गेंगस्टर और वैश्या की बात को ज्यादा सीरियस लेता. उनकी छवि में अंदरूनी द्वन्द बहुत होती है.

मुझे क्यों उस शख्स से रुरु कराया गया यह कहकर कि यह शख्स बुरा है(असामाजिक). जिस शख्स की मुझे सिर्फ एक ही तस्वीर याद है. “एक हट्टाकट्टा शख्स एक सेंडो बनियान पहने हुए एक एकडेढ़ साल की लडकी को हवा में उछल रहा था. और वो दोनों ही लगातार हंस रहे थे.” मैं रस्ते में जाते हुए उन्हें देख रहा था और उन तक अपना सफ़र दूरी तय कर रहा था कि अचानक हम एक मोड़ पर मुड़ गए. वो शख्स जो मेरे साथ थी वो यह कह रही थी कि उस तरफ नहीं जाना चाहिए. उस समय इस चीज को समझने की उम्र नहीं थी मगर छवियाँ तो याद रह जाती हैं. मैं उस क्योंको तलाशने लगा.

मेरा पहला सवाल उस छवि को सोचते हुए था जो मुझे याद है. मैंने जिस भी शख्स को यह दृश्य समझाने की कोशिश करी वो यही कहता कि,
अपनी बेटी से हर कोई प्यार करता है
तो फिर उस शख्स की पहचान में यह हर कोईवाला सेन्स कहाँ गायब हो जाता है?
समाज में कुछ चीजों को तो अलग रखना ही होता हैं!”

क्यों कुछ चीजों/लोगों को अलग रखना होता हैं? यह अलग रखने का मतलब क्या है?

समाज मे कई संबन्ध होते हे जिन के रिश्तो की कसौटी पर हर किसी को खरा उतरना होता है। हम एक समाज मे रह कर भी अपने लिये अपना बनाया वातार्वण चहाते है। जिस के लिये मन मूताबिक करने की ठान लेते है । मगर समाज मे रिश्तो को बनाये रखने और उनको अपने पास रखने के लिये हर मोड पर दूसरो को अपने काबिल और सब मे घूलेमिले रहने के लिये अपने इरादों को भूलना पडता है।हर कोइ ये कर ही पाता और जो करता है वो रिश्तो के दायरे से बहार हो जाता है । उसकी गीनती आम आदमी नही होती हो दूसरो के जैसे सा नही मना जाता कहने को
तो वो भी इंसान का ही एक हम\ शक्ल होता है। पर सिर्फ हम शक्ल हुहु नही । उसका जिवन उस हुहु बनी तस्वीर की तरह होता जो सच और झूठ के प्रतीक से अलग होतौ है । जिस की कोई पहचान नही होती । हाँ हम सोच सकते हे कि इंसान की बनाई इस दूनिया मे इंसान की ही बनाई बहुत सी पहचान है । जो इंसान को हि विभाजित करती है।

दो भाई थे, एक छोटा एक बड़ा. बड़ा भाई बहुत क्रूर और लालची था और छोटा ठीक उसका विपरीत“. कहानियों में से इन विभाजनो को न बताया जाये तो क्या कहानियां कहने के अंदाज में फर्क आ जायेगा क्या? यह कहानियां जिन निष्कर्ष तक पहुँचती है क्या यहाँ वहां तक पंहुच पायेगी?

अब सवाल यह है की इंसान अपने जीवन में अपने ऊपर अगर किसी तरह के प्रहार/टॉर्चर को महसूस करता है तो क्या जीवन को देखने का नजरिया उसका कुछ और होता है?
लेकिन

रास्ते मे तीन आदमी कोई चालीस बकरे ले जा रहे थे, आगे एक बन्दा बकरे का कान पकड़ता है और घसीटता है बकरा चीखता,ज़मीन पर गिरतापड़ता जाता है और बाकी उन्तालिस बकरे चुप चाप उनके पीछे पीछे चलते है और वो दो अदमी उन बकरो को छड़ी मार मार कर ले जाते है । में ये सोचता हूं एक बकरे का कान पकड़ कर वो सारी फोज को केसे कन्ट्रोल करता है , हो सकता है जिस बकरे का कान पकड़ा गया है वो जानता है कि उसको आज मोत के घात उतार दिया जाएगा इसलिए वो इतना जद्दोजेहद करता है । एक बकरा मौत के डर से नही जाता और बाकि फौज शायद इसलिए पीछे अती है कही उनका भी कान पकड़ा न जाए ।

इसको पड़कर लगा हमने अपने जीवन को कई तरह के प्रहार/टॉर्चर को देखते महसूस करते हुए बनाया है. अगर यह ना होते तो जीवन की इस stability / vibration को समझ पाना जैसे नामुमकिन था


हमारा जीवन अध्यायोंमें नहीं होता क्योंकि अध्याय ख़त्म होते हैं दुसरे अध्यायों को खोलने के लिए. व्यक्ति और व्यक्तित्व में जो फर्क है वो सिर्फ लिखने या उच्चारण का नहीं हैं. इन दोनों ही शब्दों के फेर में इंसान से जो एक्स्पेक्ट किया जाता है वो किस तरह बदल जाता है?

January 28, 2010 Posted by | Uncategorized | 2 Comments

Impression and Movement

एक बार घर में बैठा यूंही कुछ सोच रहा था. तभी DJ की तेज़ आवाज़ ने मेरा ध्यान तोड़ा. पड़ोस में एक शादी होने वाली थी और उससे पहले होने वाले डांस में कालोनी से अलग-अलग तरह के शख्स नाचने के लिए आने लगे.
मैं कभी नहीं समझ पाया की जब कोई शख्स किसी एक समूह के बीच खड़ा डांस कर रहा होता है तो उसके मन में क्या चल रहा होता है. कई छवियाँ दिमाग में आती है मगर उन छवियों का मेरे इन सवालों में क्या स्थान है समझ नहीं आता ? मैंने अपने सवालों को अपने कुछ दोस्तों को भेजना शुरू करा.
उनसे हुई बातचीत से कुछ चीजे उभरी.

1st Person : पडोस मे एक शादी होने वाली है तो हर रोज़ कुछ डांस वगैरह हो रहा है। वहाँ एक ऐसा शख़्स डांस करने के लिये बीच मे आया जिसने सबका ध्यान कुछ समय के लिये अपनी ओर इतनी तेजी से खींचा कि क्या हुआ? समझ मे नहीं आया। वो डांस नहीं कर रहा था बल्कि सामने वाले के इम्प्रेशन और मूवमेंट को देखकर कुछ स्टेप बनाने की कोशिश कर रहा था। पहली बार देखा की डांस मे किसी के लिये बोल और रिद्धम का कोई रोल नहीं होता ओडियंस और डांसर के लिये। बाहर के आक्रषण को इतनी इंटरनल फोर्स से बाहर आते हुए नहीं देखा था।

2nd Person : किसी को देखना और उसी से मिलना इन दोनों धारणाओ मे कुछ तो फर्क होता है। जिसे आप रोज़ देखते हो उसे मिले हो ये नहीं होता और जिससे मिलते हो उसे देखते हो ये भी नहीं। मिलना और देखना दोनों एक बोद्धिक रूप के तहत बोलने की कोशिश है। मिलने और देखने को अगर हम इस धार से देखे तो।

काफी टाइम से अपनी ही गली मे लोग को देख रहा हूँ। सोचता हूँ ये आखिर मे कैसे हैं? इनको कब समझूँ? अगर कोई पहली बार गली मे आकर पूछता है की गली के लोगों के बारे मे बोलो तो क्या कहूँगा? मैं जिनसे मिलवाऊँगा वो शायद उनका ऊपरी तहकीकात से तहत होगा। उनको देखने के समान। अगर मिलने के तौर पर जाऊँ तो? फिर एक टाइम बनाया – अगर उनको इन टाइम पर देखूँ तो – जैसे,
पहला : जब उनकी लड़ाई हो रही हो।
दूसरा : जब वो डांस कर रहे हो।
इस दौरान वही शख़्स मेरे रोज़ाना के आँकड़ों से बेहद दूर थे। कह सकते थे की उम्दा थे। यहाँ पर मालुम हुआ की दिन दोनों धाराओ के बीच का वक़्त मिलना नहीं देखने के समान होता है।

1st Person : मैं थोड़ा डाउट मे हूँ मेरे भाई। क्योंकि डांस जैसी चीज़ हर समय के लिये नहीं होती। हम किसी शख़्स को उसके डांस से जज़ नहीं करते। कई किसी इंसान की छवि वो ठोस रूप से जम जाती है जब वो डांस करता है। मेरी एक साथी ने जब मुझसे सवाल किया था की बौद्धिक जीवन कहकर पहली छवि दिमाग मे क्या आती है तो मेरे दिमाग मे पहली छवि एक डांसर की ही आई थी।

शरीर का वो रीएक्शन जिसको सोच पाना और उसे व्यक्त कर पाना मेरे लिये वो टास्क है डांसर और किसी से उनके मिलने को समझ पाना।

2nd Person : मेरे ख्याल से सब कुछ अपने ही आँकड़ों से समझा नहीं जा सकता। कुछ तो खुद को तोड़ते हुए समझना होगा। जैसे – मैं अपने घर मे एक शख़्स को देखता हूँ। जो मेरे डांस और डांसर को समझने के अनुमान को तोड़ देता है। मैं उसे मान लो समझता हूँ, एक भाई, घर का एक सदस्य या एक आदमी मगर वो हमेशा कुछ और ही होता है।

जब भी घर मे कोई प्रोग्राम होता है तो सभी उससे एक उम्मीद रखते हैं की वो नाचेगा और सबको नचायेगा। मगर वो कभी डांस करता ही नहीं। बस, देखता रहता है और जब खींचातऊޠĨी होती है तो बाहर चला जाता है। जब भी कोई डांस का माहौल तैयार होता है तो सभी उसी की शक़्ल देखते रहते हैं। कोई नहीं समझ पाता की वो ऐसा क्यों करता है?

1st Person : असल मे, मेरी दिक्कत किसी डांसर को सोचते हुए नहीं है। अपनी लाइफ का सबसे यूनीवन पोंइट इस तरह के फोर्म मे क्यों बाहर आता है? और उसके ओडियंस की जरूरत क्यों है?

2nd Person : माफ किजियेगा – मगर मैं इंसान को समझने की तीव्रता ताक जाने कि कोशिश मे ये सब बोल रहा हूँ। ये भाव का आना है या भावों को दबाना है? इसको समझने की कोशिश मे ये कुछ लाइने हैं। शायद हमें मिलने की जरूरत है।

बातचीत यहीं पर ख़त्म हो गई, मगर हमारे सवाल अभी भी खत्म नहीं हुए थे.
अपने प्रदर्शन में लोगो के सामने अपनी कोई दूसरी छवि रखने वाले शख्सों की अपनी छवि को कितना संभल कर रखते हैं किसी एक खास पल के लिए वो पल जो कभी उनका नहीं होता.

हमारे यह सवाल किसी performer को सोचते हुए नहीं थे बल्कि. बल्कि हम कभी किसी शख्स कि किसी एक खास छवि से प्रभावित होते हैं भले ही हमने उस तहः कि अदाकारी करते कई लोगो को देखा है मगर किसी इन्सान कि यह दूसरी छवि का जो effect है उसे कैसे सोचे?

जीवन मे हर चीज़ बनी बनाई नहीं मिलती  और ना ही कोई चीज़ अपने रूप मे सदा रह सकती है उसे किसी ना किसी रूप मे बदलना पड़ता है या वो खुद को बदल लेती है मगर सवाल यह है की किसी बदलाव पर टिप्पणी करने से पहले यह समझना ज़रूरी नहीं की यह बदलाव उसने खुद किया है या यह बदलाव लाया गया है? क्या दोनो ही सूर्तों मे आपके reaction सेम होंगे? शायद नहीं , शायद ऐसा ही कुछ हम अपने सवालों के साथ भी कर रहे हैं, किसी एक तरफ़ा रूप को कोई आकर देने कि कोशिश कर रहे हैं?

समाज में उतरने के तरीके और भी भी हो सकते हैं, क्या हमने कभी उस उतरने के तरीके क्यों और कहाँ से आते हैं उसको समझने की कोशिश करी है? क्या उसको समझने के कोई तरीके हैं?
मैं जितना सोचता गया उतनी ही तरह कि छवियाँ या उतने ही तरह के सवाल बनते चले गए. मगर मैं क्या तलाश रहा था यही पता नहीं चला?

सवाल और भी हैं फिर मिलेंगे

January 4, 2010 Posted by | Uncategorized | 1 Comment

A Space Odyssey

मेरे सामने चल रहे दृश्यों में मैं किस चीज़ से बहस मे हूँ यह समझ हीं नही आ रहा था। इसमे यादों की कोई जगह नहीं थी।

कुछ चीज़े ऐसी है जो हमारे Mind को शेक करती हैं, मगर उसके बाद क्या हुआ उसका बोध नहीं हो पाता। इन दृश्यों को देखने के बाद कुछ चीज़ों ने सीधे ही दिमाग मे कुछ सवाल बनाने शुरू किए, कुछ चीज़ो को समझने के लिए हम या तो तुलनात्मक होते हैं या वर्गीकृत।

हम सभी के लिए चीज़ो को देखते हैं तो यह दिमाग में होता है कि हम उसके वस्त्र के साथ उसको देख रहे हैं, नंगा शरीर उसे देखने के सारे भावों को बदल देता है। शायद किसी चीज़ को उसके बिना वस्त्रों मे देख पाने की क्षमता हमारे outer Life मे है ही नहीं।


The most eternally beguiling, with a seemingly endless amount of theories bandied about on what it all means.

There is no other image that has been able to fill me with such a sense of awe. its true meaning is eternally elusive. Uniquely overwhelming experience of sight and sound, time of vaults.

मैं अपने दो दोस्तों के साथ एक लाल बत्ती से सटी मुंडेर पर बैठा था। वहाँ से एक कुत्ता गुज़रा तो मेरे एक दोस्त महेश ने आवाज़ लगाई नरेश कहाँ जा रहा है?” मेरा दूसरा दोस्त जिसका नाम नरेश है वो उसे यह बात बुरी लगी, वो शांत हो गया। जब उससे पूछा कि कि जब क्या हुआ तो वह बोला: जब मुझे किसी जानवर के साथ जोड़ा जाता है तो मुझे बुरा लगता है।

मैंने उन्हे यह इस फिल्म के शुरू के 32 मिनट दिखाना शुरू कर दिया। शुरू के कुछ मिनट तो दोनों मस्ती करते रहे, मगर 32 मिनट तक माहौल मे एक खामोशी आ गई थी। वो किस चीज़ की खामोशी थी मैं आज तक नहीं समझ पाया। कुछ देर बाद नरेश बोला कि, “लोग भी ऐसे ही हैं, कुछ नहीं बदला है बस शरीर पर कपड़े आ गए हैं।

हम कुछ भी नहीं बोले।

कुछ समय बाद जब मैं घर वापस आ रहा था तो, एक चीज़ ने suddenly मुझे strike करा कि जो शख्स(नरेश) जानवर कहलाए जाने पर गुस्सा करता है, जब वो जानवर होना सार्वजनिक है तो उसे कुछ भी अजीब नहीं लगता क्यों?

इन दोनो चीज़ो के बीच का गेप मात्र 2 घंटे का ही था कुछ भी नहीं बदला था। मगर दो अलग तरह की जीवनशैलियों से जैसे टकरा सा गया था। मैं काफी देर तक इस चीज़ को सोचता रहा।

December 23, 2009 Posted by | Uncategorized | Leave a comment

Paycheck

फिल्म मे मिशेलको एक बहुत बड़ी रकम के बदले एक काम करने को ऑफर मिलता, मगर बदले में उससे काम के अलावा एक और चीज़ मांगी जाती है। उसकी ज़िंदगी के तीन साल, जो कि काम खत्म होने के बाद उसके दिमाग मे से सदा के लिए इरेस कर दिए जाएंगे। वो हाँ तो करता है मगर यहाँ सवाल सिर्फ उन तीन सालों का नहीं है बल्कि उसकी आने वाले तीन साल का है जिसे कोई जिएगा यह सोचते हुए कि उसके जीवन से यह निकल जाने वाले हैं। या शायद दूसरे तरीके से सोच सकते हैं वो अपने जीवन की ऐसी वैल्यू बनाने जा रहा है जिसका आगे उसके लिए कोई अस्तित्व नही होगा।

इस फिल्म का जो आकर्षण है वो यह कि आपने कुछ किया है अपने जीवन के तीन साल देकर, ना आपको अपने तीन साल पता है और ना वो जो आपने किया है, मगर आपको उसके बदले कुछ मिला है।

हम अपने आसपास हमेशा से सुनते आए हैं कि मैंने अपना जीवन किसी चीज़ मे बिता दिया, मगर उसने उस समय को जिया है, उसे अपने आसपास के सारे उतार चढ़ाव को देखा है। यह सोच बहुत हद तक उस सोच को उभार पाती है कि आपके अपने जीवन मे बीते समय जो शायद आपने व्यर्थ करे हो उसकी कोई वैल्यू तो है। वो वैल्यू आपको खुद समझनी होती है उस समय की वैल्यू को।

नींद आपको सपना देती है, शायद वो सपना आपको सोए हुए समय को जीने का सबूत देती है। जिसका वास्तविकता से कोई रिश्ता होना ज़रूरी नहीं है। शायद कुछ लोगो को सोते हुए सपने ना आते हों मगर इसका मतलब यह तो नहीं है ना कि सोनाव्यर्थ है।

आप नींद के कुछ घंटे सपने देख रहे होते हो बंद आँखों से तो क्या यह सपना आपने बीत गए घंटो के मूल्य के बरारबर है?

उदाहरण:- कोई तीन साल बाद अपने आप को कहाँ देखता है?(ओहदा, स्थान) मुझे वो उसको मिलता है मगर मगर तीन साल बाद नही अभी,मगर सब लोग तीन साल आगे निकल गए हैं सिवाए उस शख्स के। तो उसके साथ जो हुआ वो क्या है?

जीवन भी कुछ ब्याजकी तरह है किसी चीज़ का मूल्य आपके खुद के लिए क्या होगा समय बीतने के बाद उसका आंकलन करना आसान नहीं है।

क्या हमारे सपने और हर कल्पनाएं एक सही वक्त के लिए नहीं है। उस समय से बाहर उसका कोई मूल्य नहीं है।

समय के अपने कोण होते हैं।

हमारे लिए हमारे वर्तमान का क्या मूल्य हैं? शायद कहने में कोई ऐसी खास बात नहीं है, क्योंकि जब हम अपनी ज़िंदगी के कोण को वर्तमान में देखते हैं तो वह 0डिग्री का दिखता है। जिसका ना झुकाव है और ना ही कोई मोड़, इस तरह की कोई भी चीज़ हमे या तो हमारे पिछले समय मे दिखती है या आने वाले कल मे, जहाँ वो 0डिग्री कोई आकार ले रही है।

October 12, 2009 Posted by | Uncategorized | 1 Comment

A Man Escaped

we dont reckon time the same way.

ऐसा शायद ही होता है जब चल रही तस्वीर और आवाज़ दोनों एक ही बात कह रही हों। हम हमेशा दोनो के बीच का एक किनारा ढूँढ़ लेते हैं।आवाजे कभी हमें वो नहीं बताती जो हम देख रहे होते हैं। आवाज़ मे हमेशा से एक दिशा रही ही है। हम किस दिशा मे देखेंगे यह हमारा फैसला हो सकता है मगर आवाज़ों पर हमारा ज़ोर नही है।

. His blood-stained face pokes out from behind his jacket, thrown over him. He appears dead or at least unconscious, but then his narration begins: “I could feel I was being watched. I didn’t dare move.”
यह जो फोर्स थी वो कहाँ से आई?

I reminded of Fontaine’s inner strength and craftiness:-
हम कई बार भाग जाना चाहते हैं, ना भाग जाने का बोध है ना ही उस गति का जिसमे हम भागेंगे। हम कई बार इस गति को इतना तेज़ सोचते हैं कि हम बस भागे जा रहे हैं उस गति मे जहाँ कोई चीज़ हमसे दूर नहीं है, मगर हम किसी चीज़ के पास भी नहीं हैं। पर जीवन की जो फोर्स है वो उस कागज़ की तरह है जो किसी भी फौर्स के पीछे कुछ देर के लिए उसके साथ चल देती है। हमारे जीवन की Internal Life इस चीज़ को दर्शा पाती है कि आपमे कौन सी फोर्स है जो किसी को खींच सकती है, या वो कौन सी फोर्स है जो आपको खीच सकती है। इसके बाहर कुछ है तो वह गति जिसमे ना हमारे पास कुछ है ना ही हमसे दूर, या यो वो stillness जिसमे हमारे सामने से कोई चीज़ कितनी ही गति और शोर मे गुज़र जाए हमारे पास उस गुज़र जाने का एहसास नही होता

The most moving moments in the film are those in which the text and image are saying the same thing, each however in its own way. The sound never serves simply to fill out what we see . . . It is here at the edge between sound and image

  • to be continued

    October 12, 2009 Posted by | Uncategorized | Leave a comment